सरल जानकारी
इनकम टैक्स कैलकुलेटर: पुरानी बनाम नई व्यवस्था (FY 2026-27)
यहाँ से शुरू करें · इनकम टैक्स आसान भाषा में
पहले समझें: दो टैक्स व्यवस्थाएँ क्या हैं?
हर साल आप चुनते हैं कि आपकी आय पर टैक्स किस व्यवस्था में लगे। नई व्यवस्था में दरें कम हैं पर कटौतियाँ बहुत कम मिलती हैं। पुरानी व्यवस्था में दरें ज़्यादा हैं, पर 80C, स्वास्थ्य बीमा, होम लोन ब्याज और HRA जैसे निवेश और ख़र्च घटाए जा सकते हैं। यह कैलकुलेटर आपके आँकड़ों पर दोनों चलाकर बताता है कि कौन सी सस्ती पड़ेगी।
पहले बुनियादी बातें समझें, फिर गणना करें ↓कैलकुलेटर कैसे इस्तेमाल करें
- सालाना आय डालेंकिसी भी कटौती से पहले की सकल आय डालें। वेतनभोगी या पेंशनर हों तो बॉक्स पर टिक करें ताकि स्टैंडर्ड डिडक्शन लगे।
- वही कटौतियाँ जोड़ें जो आप सच में लेते हैं80C, 80D, होम लोन ब्याज और HRA सिर्फ़ पुरानी व्यवस्था में मिलते हैं। नियोक्ता का NPS दोनों में गिना जाता है।
- नतीजा और ब्योरा पढ़ेंआपको बेहतर व्यवस्था, सालाना बचत और दोनों का पंक्ति-दर-पंक्ति हिसाब मिलता है।
सैलरी ₹15,00,000, कोई कटौती नहीं
नई व्यवस्था ₹97,500वही व्यक्ति
पुरानी व्यवस्था ₹2,57,400FY 2026-27 की दरों पर सेस सहित कुल टैक्स। पुरानी व्यवस्था तभी बराबरी करती है जब आप बड़ी कटौतियाँ लेते हैं।
कटौती में क्या गिना जाता है?
- 80C: PPF, EPF, ELSS, जीवन बीमा, होम लोन मूलधन (₹1.5 लाख तक)।
- 80D: स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम। 80CCD(1B): अपना NPS ₹50,000 तक।
- स्वयं के घर के होम लोन ब्याज पर ₹2 लाख तक, और किराया देने पर HRA।
किन बातों का ध्यान रखें?
दरें बदल सकती हैं। बजट हर साल स्लैब बदल सकता है।
बदलने के नियम अलग हैं। वेतनभोगी हर साल चुन सकते हैं। व्यवसाय से आय वाले लोगों के पास वापस बदलने के मौक़े सीमित होते हैं।
कैपिटल गेन शामिल नहीं हैं। उन पर विशेष दरों से टैक्स लगता है।
पुरानी बनाम नई टैक्स कैलकुलेटर
दोनों व्यवस्थाओं में अपना टैक्स तुलना करें
आपकी जानकारी
आँकड़े सालाना रुपयों में डालें। ख़ाली छोड़ने का मतलब शून्य।
सैलरी, पेंशन, ब्याज आदि, कटौतियों से पहले।
दोनों व्यवस्थाओं में लागू।
पुरानी व्यवस्था की कटौतियाँ
अधिकतम ₹1,50,000
अधिकतम ₹50,000
अधिकतम ₹1,00,000
अधिकतम ₹2,00,000
अपनी गणना से
बाक़ी का कुल
आपका नतीजा
FY 2026-27 की दरें, 4% सेस सहित
आपके लिए बेहतर
–
प्रभावी दर: नई व्यवस्था · पुरानी व्यवस्था
आपका टैक्स कैसे निकला
दोनों व्यवस्थाओं का पंक्ति-दर-पंक्ति हिसाब।
| चरण | नई व्यवस्था | पुरानी व्यवस्था |
|---|
नई व्यवस्था के स्लैब (FY 2026-27)
| कर-योग्य आय | दर |
|---|---|
| ₹4 लाख तक | शून्य |
| ₹4–8 लाख | 5% |
| ₹8–12 लाख | 10% |
| ₹12–16 लाख | 15% |
| ₹16–20 लाख | 20% |
| ₹20–24 लाख | 25% |
| ₹24 लाख से ऊपर | 30% |
पुरानी व्यवस्था के स्लैब (60 से कम)
| कर-योग्य आय | दर |
|---|---|
| ₹2.5 लाख तक | शून्य |
| ₹2.5–5 लाख | 5% |
| ₹5–10 लाख | 20% |
| ₹10 लाख से ऊपर | 30% |
वरिष्ठ नागरिकों (60–79) के लिए ₹3 लाख तक और अति वरिष्ठ (80+) के लिए ₹5 लाख तक शून्य। ₹5 लाख कर-योग्य आय तक ₹12,500 का रिबेट मिलता है।
इस अनुमान में क्या शामिल नहीं है
कैपिटल गेन, व्यवसाय की आय, ₹50 लाख से ऊपर सरचार्ज पर मार्जिनल रिलीफ़, और कृषि आय जैसे विशेष मामले। इनके लिए आधिकारिक टूल या टैक्स विशेषज्ञ की मदद लें।
आयकर अधिनियम, 2025 1 अप्रैल 2026 से लागू हुआ और धाराओं की संख्या बदली गई। हम 80C जैसे जाने-पहचाने नाम ही रखते हैं ताकि पहचानना आसान रहे।
और पढ़ें
पूरी तुलना, ब्रेक-ईवन तालिका और कटौती के नियम हमारी गाइड में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
डिफ़ॉल्ट व्यवस्था कौन सी है?
नई व्यवस्था डिफ़ॉल्ट है। पुरानी चाहिए तो उसे चुनना पड़ता है, और वेतनभोगी TDS के लिए नियोक्ता को बताते हैं कि कौन सी लगानी है।
क्या हर साल बदल सकता हूँ?
वेतनभोगी रिटर्न भरते समय हर साल व्यवस्था चुन सकते हैं। व्यवसाय या पेशे से आय वाले लोग नई व्यवस्था में सिर्फ़ एक बार वापस आ सकते हैं।
₹12.75 लाख पर मेरा टैक्स शून्य क्यों है?
₹75,000 स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद कर-योग्य आय ₹12 लाख रह जाती है, और नई व्यवस्था में 87A रिबेट उस स्तर तक टैक्स शून्य कर देता है।
क्या नई व्यवस्था में नियोक्ता के NPS की कटौती मिलती है?
हाँ, धारा 80CCD(2) के तहत नियोक्ता का योगदान तय सीमा में दोनों व्यवस्थाओं में मान्य है। आपका अपना NPS योगदान सिर्फ़ पुरानी व्यवस्था में मान्य है।
यह कैलकुलेटर कितना सटीक है?
नियमित आय के लिए यह अच्छा अनुमान है। कैपिटल गेन, सरचार्ज राहत, पहले कटे TDS या विशेष कटौतियों के कारण असली टैक्स अलग हो सकता है। रिटर्न भरने से पहले आधिकारिक कैलकुलेटर या विशेषज्ञ से जाँच लें।
यह कैलकुलेटर सिर्फ़ जानकारी के लिए है, टैक्स सलाह नहीं। हर बजट में दरें और नियम बदल सकते हैं। फ़ैसला लेने से पहले आयकर विभाग या योग्य विशेषज्ञ से पुष्टि कर लें।